सफलताके लिए समजदारीसे कड़ी मेहनत ( hardwork ) करो ,आप इसके बिना कुछ भी हासिल नहीं कर सकते

सफलताके लिए समजदारीसे कड़ी मेहनत ( hardwork ) करो ,आप इसके बिना कुछ भी हासिल नहीं कर सकते

सफलताके लिए SMART hardwork जरुरी है

      सफलताके लिए hardwork करना जरुरी है – यह यवकृतको कडा तप करके पता चला।  भारद्वाज ऋषि के पुत्र का नाम यवकृत था । भारद्वाज ऋषि बड़े ही मशहूर ज्ञानी और विद्वान  थे । उनको  सभी मान देते थे। ऋषि भारद्वाज का एक मित्र था जिसका नाम था रैभ्य ।उनके दो पुत्र थे एक पर परावसु और दूसरा अवार्वसु  । उनके दोनो पुत्र वेदाभ्यास में बड़े माहिर तथा विद्वान थे । उनकी विद्वता की कीर्ति चारों तरफ फैली थी। 

              ऋषि भारद्वाज खुद तपस्या में काफी सारा समय बिताते थे इसीलिए उनका बेटा यवकृत पढ़ाई में पीछे रह गया। वह देखता जा रहा था कि सारे ब्राह्मण रैभ्य ऋषि का आदर करते हैं । उनको सभी मान देते हैं। वह यह सोचने लगा कि, “मेरे पिता की तथा लोगों की नजरों में मेरी कोई कीमत ही नहीं है। और इसका कारण यह हो सकता है कि उनकी विद्वता और इनका काम बहुत ही सराहनीय  है ।” 

         रैभ्य और उनके बेटों की  स्थिति देखकर यवकृत  मन ही मन में जलने  लगा। उसने तय किया कि मैं कुछ भी करके  विद्या और ज्ञान प्राप्त कर लूंगा । लेकिन उस की एक बहुत बड़ी समस्या  थी।  उसको पढ़ना पसंद नहीं  था और कुछ hardwork नहीं करनी थी ।उसने तय किया कि मैं तपस्या करूंगा और तपस्या के बल से मैं सारा ज्ञान प्राप्त कर लूंगा । मैं बड़ा विद्वान बन जाऊंगा।

   वह तपस्या करने बैठ गया। उसने इंद्र को प्रसन्न करने के लिए अपने शरीर को कष्ट देना शुरू किया। उसने तप आगे बढ़ाया । बहुत सारे सालों तक तपस्या की, तब इंद्र देव पर उसकी घोर तपस्या का असर होने लगा ।आखिर उसकी कठोर तपस्या देखकर इंद्र देव खुश हो गए। देवराज इंद्र ने वहां आकर उससे पूछा , “यवकृत तुम क्यों इतनी घोर तपस्या कर रहे हो?”  

      यवकृत ने कहा, “हे देवेश, मुझे सभी वेदों का  ज्ञान बिना मेहनत किए चाहिए ।मुझे सारा ज्ञान मिल जाए ताकि मुझे कोई अध्ययन करने की या पढ़ने की जरूरत ना हो । मैं इस गुरूकुल में वास करके खुद भी पढ सकता हूं, लेकिन इस झंझट में मुझे नहीं पङना है। कितने दिमागी कष्ट करने पड़ते है ।

सफलताके लिए hardwork का कोइ पर्याय नही ।

अध्ययन के सिवाय आश्रम में तरह-तरह के काम करने पड़ते हैं। बहुत सारी बातें याद रखनी पड़ती है और कठीन से कठीन पढाई  भी करनी पड़ती है । मुझे इन सब बातों में नहीं पड़ना है ।अपने शरीर को और मन को कष्ट नहीं देना है । हे देवराज , आप मुझ पर कृपा कीजिए कि मैं आपके आशीर्वाद से एकदम समर्थ विद्वान बन जाऊं और सारा ज्ञान प्राप्त कर लूं । मुझे कोई hardwork नहीं करनी पड़े। मुझ पर कृपा कीजिए । मेरी तपस्या का फल दीजिए।” 

         यवकृत की बात सुनकर इंद्र को हंसी आई वह बोले, “अरे मूर्ख, तूने तो उल्टा रास्ता पकड़ लिया है। इतने बड़े  विद्वान और ज्ञानी पुरुष के पुत्र होकर तुम ऐसी बात क्यों करते हो ? जिस तरह से और लोग सेवा करके और अच्छी तरह से पढ़ाई करके विद्या प्राप्त करते है,  इसी तरह से प्राप्त करनी चाहिए, तब तुम विद्वान भी कहलाओगे और तुम्हारी मेहनत को लोग सराहेंगे। यह सब बातें भूलो ।”  

              यवकृत कुछ आगे बोलता इतने में तो  देवराज अदृश्य हो  गए। लेकिन यवकृत बड़ा जिद्दी आदमी था ।उसे तप तो करना था तो अपने शरीर को तना था लेकिन पढ़ाई के लिए मेहनत नहीं करनी थी । उसने और भी कड़क तपस्या कर करना चालू कर दिया ।

दूसरी तपस्या से फिर से इंद्र को आंच लगी इसीलिए स्वर्ग के अधिपति इंद्र फिर से आ गए और उसने कहा, “हे यवकृत, तुम क्यों नासमझी में यह गलत जिद्द लेकर बैठे हो? तुम्हारे अपने पिता बड़े  विद्वान हैं, उनसे जाकर सीखो उनकी तरह का ज्ञान किसी के पास नहीं है । उनसे सीखोगे  तो आप उनसे भी आगे चले जाओगे । दूसरा कोई रास्ता नहीं है।  क्यों बेवजह अपने शरीर को तकलीफ दे रहे हो ? अभ्यासमे सफलता लिए hardwork करो ।” 

सफलताके लिए hardwork  जरुरी है
ईन्द्रदेव: सफलताके लिए hardwork बिना कुछ भी हासिल नहीं कर सकते

    लेकिन इंद्र की यह बात सुनकर यवकृत तो और भी नाराज हो गया । और उसने कहा, :” जाओ इंद्र तुम तो मेरी इच्छा पूरी करने वालों नहीं हो,तो अब मैं क्या करूंगा? अपने शरीर का एक-एक टुकड़ा काट के आग में उसका उसकी आहुति दे दूंगा। और  मैं आगे बढ़ाते जाऊंगा जब तक मेरी इच्छा पूरी नहीं होती । मैं तुम्हें कहता हूं कि मुझे पढ़ने की कुछ तकलीफ करने कि इच्छा नहीं है। मैं आपसे दूसरी बार कह रहा हूं – कि मुझे मेरे रास्ते से हटाने की कोशिश मत करना ।”

        इंद्र को अभी कुछ बोलना बाकी नहीं रह गया । वह चले गए और यवकृत अपनी तपस्या में लगा रहा । एक दिन वह गंगा स्नान करने जा रहा था। वहां पर उसने एक अजीब सा दृश्य देखा ।गंगा नदी के किनारे एक बूढा ब्राह्मण बैठा था और हाथ से गंगा जी की किनारे पर की रेत को एक एक मुट्ठी में लेकर नदी में डाल रहा था ।

यह क्या गजब की बात है? सोचकर उसने ब्राह्मण से पूछा :”आप इस रेत को मुट्ठी में भर के पानी में डाल रहे हो , अरे आप क्या कर रहे है?” ब्राह्मण ने उसको जवाब दिया “देखो सब लोगों को गंगा के उस पार जाने के लिए बहुत तकलीफ हो रही है । मुझे भी उस पार जाना है इसीलिए मैं देख रहा हूं कि यह रेत गंगा के पानी में डाल डाल कर एक रास्ता बनाउँ ताकि मैं और बाकी सब लोग जिसको उस पार जाना है वह अच्छी तरह से पहुंच जाए। समझ गए इसी कारण से मैं यह रेत की मुट्ठी भर भर के पानी में डाल रहा हू।”

         यवकृत यह सुनकर बड़े जोरों से हस पड़ा। “अरे बुड्ढे, तेरी अक्ल क्या घास चरने को गई है  ?यह इतनी बड़ी गंगा नदी जो घसमस बहती है, उसमें तुम अपने हाथ से छोटी-छोटी मुट्ठी से रेत भरकर डाल रहे हो उससे क्या रास्ता बन जाएगा? क्यों इतनी दिमाग मारी कर रहे हो? और कोई काम है तो करो और इसे छोड़ दो ।”

    तो बुड्ढा बड़ी स्वस्थता से बोला, “मेरे भाई तुझे ऐसा लगता है कि मैं नाहक दिमाग मारी कर रहा हूं ।ठीक है ना ,तू भी वेदों को इसी तरह बिना कुछ मेहनत किये, जानने के लिए और वेदों मैं पारंगत बनने के लिए तप करना चाहता है । मेरी मेहनत तो बर्बाद नहीं जाने वाली है लेकिन मैं तो गंगा में रेती डाल के रास्ता बनाऊंगा। लेकिन तुम्हारा क्या होगा ? क्या  तपस्या करनेसे कष्ट नही होगा? तुम्हारी पूरी जिंदगी इस तरह से खामखा की तपस्या करने में ही बीत जाएगी ।” 

          यवकृत उस बुड्ढे को बड़े ध्यान से देख रहा था । उसको तुरंत समझ में आ गया कि यह तो देवराज इंद्र ही है ।मुझे सही रास्ते पर लाने के लिए गंगा नदी में रेत डाल रहे हैं । वह नतमस्तक हो गया और बोला ,“ देवराज अगर मेरी तपस्या बर्बाद जाने वाली है तो आप मुझे यह वरदान तो दे सकते हो कि मैं बहुत बड़ा विद्वान बनूंगा ।” इंद्र ने बड़ी प्रशंसाके साध उसे कहा “तथास्तु। अब जाओ और वेद का अध्ययन और पाठ करो और जब तुम्हारा कर्म परिपक्व होगा,तब तुम महाविद्वान बनोगे, देशभर में और दुनिया भर में तुम बड़े मशहूर हो जाओगे।”   

       घर आकर, पिता के पास रहकर उसने वेदों का अध्ययन किया और बड़े चाव से सब कुछ पढ़ाई की और समय जाते वह बहुत बड़ा पंडित बना और उसका बहुत नाम हुआ। देवराज इंद्र के वरदान से  वह बड़ा समर्थ पंडित बना। सफलताके लिए hardwork करनी चाहिए , यह छात्र आप भी समज लोॆ ।

सीख : ज्ञान  हम अपने स्वयं के प्रयासों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं और बुद्धिमत्ता के पास कुछ नहीं, या तपस्या करने से अधिक मूल्य है। जो हमें कठिन परिश्रम से प्राप्त होता है उसका मूल्य जीवन भर रहता है  और हर कोई इसका सम्मान करता है। जीवनमे शोर्टकट कभी न अपनाएँ ।

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