
Should children watch fast paced content? आज की भागती दौड़ती दुनिया में सब कुछ बहुत तेजी से बदल रहा है। विज्ञान के प्रभाव से आधुनिक तकनीक का हर तरफ बोलबाला है। सुख संसाधनों ने समाज के हर वर्ग को लाभ पहुंचाया है। ये सच है कि इन सबसे कहीं न कहीं समय और श्रम की बचत होती है। पर इस डिजिटल एज में समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जिसे हम कल का भविष्य कहते हैं, एक विशेष दुष्प्रभाव की चपेट में आ रहा है। हम बात कर रहे हैं 2 से 5 वर्ष के बच्चों के स्क्रीन एडिक्शन की। Should children watch fast paced content?छोटे बच्चों के लिए बहुत हानिकारक है फास्ट पेस्ड स्क्रीन कंटेंट.
अभी हाल ही में इंग्लैंड में कराए गए एक रिसर्च में ये बात सामने आई है कि बहुत छोटी उम्र के बच्चे विशेष रूप से 2 से 5 साल की उम्र वालों में तेज गति वाले कंटेंट देखने की टेंडेंसी बढ़ रही है। लेकिन इस तरह के कंटेंट इस उम्र के बच्चों के सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम पर हानिकारक प्रभाव डालता है।
जाहिर सी बात है कि इतने छोटे बच्चे बड़ों की तुलना में दिखाई गई जानकारी को समझने में बहुत ज्यादा समय लेंगे। परिणामस्वरूप जब वो चीजों को समझ नहीं पाते तो उसका प्रभाव उनके शरीर व दिमाग पर पड़ता है और वो इस तरह प्रतिक्रिया देते हैं जैसे सब कुछ सच है। इस तरह किसी खतरनाक चीज को देख कर वो अपने आप को खतरे में मान लेते हैं जबकि वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं होता। Now it makes us think. Should Children Watch Fast Paced Content?

ऐसा देखा जाता है कि जो बच्चे बहुत छोटी उम्र से टीवी या मोबाइल चलाने लगते हैं उन्हें भविष्य में अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करने में समस्या आती है और ये परिवर्तन उनके व्यवहार में देखा जा सकता है। मसलन ऐसे बच्चे तनाव कम करने के लिए या गुस्से में टीवी या मोबाइल का सहारा लेते हैं। इस तरह उनकी समस्या कम होने के बजाय और बढ़ जाती है।
इस फैक्ट्स को प्रूव करने के लिए मोंटास्टियर नामक परिवार पर एक एक्सपेरिमेंट किया गया। इसमें इस परिवार से कहा गया कि वो अपने बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करने का प्रयास करें। पर यहां समस्या ये हुई कि माता पिता के बेहद बिजी शेड्यूल में बच्चों को कंट्रोल करने के लिए स्क्रीन टाइम एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस प्रकार बच्चों पर पूरी तरह पाबंदी लगाना मुश्किल तो है ही इसे उचित भी नहीं कहा जा सकता।
इस प्रकार इस महत्वपूर्ण विषय पर गहन शोध के बाद विशेषज्ञों की राय है कि इस आधुनिक तकनीक को बेअसर करने के बजाय बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से और समय निर्धारित करके कंटेंट देखने की परमीशन देनी चाहिए। साथ ही पेरेंट्स को चाहिए कि अपने बच्चों के साथ बैठ कर टीवी देखने की आदत डालें।
यहां एक और महत्वपूर्ण बात का उल्लेख करना ज़रूरी है वो ये कि विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि दो वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों को स्क्रीन टाइम से दूर रखना ही बेहतर है। हां किसी रिलेटिव से वीडियो कॉल पर बात करते समय ये बच्चे भी उसे साझा कर सकते हैं। साथ ही 2 से 5 साल के बच्चे पूरे दिन में एक घंटा स्क्रीन टाइम को दे सकते हैं। साथ ही इस उम्र के बच्चों को खाना खाते समय और सोने से एक घंटा पहले स्क्रीन टाइम से दूर रहना चाहिए।
अधिकांश कामकाजी माता-पिता अपने बच्चों को टीवी, मोबाइल कार्टून या अन्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया देखने की आदत डाल देते हैं। बच्चों के जीवन के इस महत्वपूर्ण पहलू के बारे में उन्हें शिक्षित करना आवश्यक है।

Written by
Archana Singh.
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