Bhimsen का पराक्रम , बकासुरका वध 2 ब्राह्मण परिवार को बचाना I

Bhimsen का पराक्रम , बकासुरका वध 2 ब्राह्मण परिवार को बचाना I

कहानी के पहला हिस्से यहाँ पढें भीमसेन की शक्ति, पराक्रम तथा वीरता

1. Bhimsen का पराक्रम :

ब्राह्मण यह सुनकर स्तब्ध और स्वस्थ हो गया । कुंती भीम के पास गई और बोली “बेटा, तुमको यह सारा भोजन राक्षस के पास लेकर जाना है । और मैं यह बात ब्राह्मण को गुप्त रखने के लिए कह आई । अगर, दुर्योधन को मालूम पड़ गया कि हम एकचक्रा में है तो तुमको पता है क्या कर सकता है ?

“बेटा, तू तैयार हो जाना और विजयी होना। तेरा जय जय कार हो।“”

Bhimsen तो इतने सारे खाने की बात सुनकर एकदम खुशी से फूला नहीं समाया । नेकी और पूछ – पूछ ? और उसके अंग अंग में बिजली चमक रही थी । सब भाई वहां पर एक साथ आ गए ।

युधिष्ठिर Bhimsen का यह आनंद देखकर एकदम चकित हो गया । यकीनन लगता है कि उस को कोई बड़ा काम मिला है। उनके मन में विचार आया।

उन्होंने माता से पूछा,“मां, Bhimsen क्यों आज आनंद से भर रहा है? क्या बात है कोई बड़ा काम मिला है क्या ? या तो फिर बहुत बड़ा खाना मिला है? माता ने उनको सब बात बताई ।तब युधिष्ठिर ने कहा, “ मेरी मां, तुम ने तो गजब का काम किया । भीम के साथके कारण तो हम इतने निश्चिंत है और कितने सुरक्षीत है । उसीको को तुम राक्षस के पास भेज रहे हो। उसके शौर्य और बल के ऊपर तो हमें पूरा राज्य लेना है। Bhimsen था इसलिए हम लोग उस लाक्षागृह से बाहर आए । लेकिन यह तो भीम को खोने वाली बात लगती है।”

कुंती ने उनसे कहा, “धर्मानंदन थोड़ा सोचो, हम लोग ब्राह्मण के घर में इतने दिन रहे हैं। आज उस पर बहुत मुसीबत की घड़ी आ गई है, तो हमने उनका रक्षण करना चाहिए। यह हमारा धर्म है। वैसे भले हमने ब्राह्मण के कपड़े पहने हैं लेकिन हमारा धर्म है क्षत्रिय का और अगर हम यह नहीं निभाते तो जीवन में हार जाएंगे।

तुम उस की शक्ति की बातें करते हो तो उनकी पूरी शक्ति का तो तुम्हें पता ही नहीं। लगता मैं उसकी शक्ति को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं । जो हमको वहां  वारणावत से बचाकर लेकर आया और इनको उसने मारा। मेरे बेटेके के बारे में मुझे रत्ती भर भी चिंता नहीं है। भीम ने बकासुर को मिलना ही चाहिए , उसको वहां भेजना अपना कर्तव्य है।”

2. Bhimsenका पराक्रम :बकासुर का वध 2

तब वहां नगर के लोगों ने नियम के हिसाब से मांस, मदिरा कई मिठाइयां , खानपान वगैरे बैलगाड़ी में भरकर भीम को बैलगाड़ी दी गई। बैलगाड़ी को दो काले बैल को लगाया गया और लोग उनको छोड़ने को गए।

गांव की सीमा पर पहुंचकर लोग वापस आ गए । वह अकेला रह गया ।उसने गाड़ी को बड़े जोरों से चलाया और Bhimsen बकासुर की गुफा के पास पहुंचा । देखा तो रास्ते में बहुत सारी इंसान की और जानवरों की हड्डियां और कंकाल पड़े थे। खून की तो जैसे नदियां बहती हो। कही टूटे हुए हाथ, टूटे हुए पैर थे।  बड़ी गंदी बदबू आ रही थी। ऊपर आकाश में गीदड और चीर  चक्कर काट रहे थे। यह सब देखते भीम को जरा भी डर नहीं लगा।

वह सोचने लगा। मेरे पास इस बैलगाड़ी में बहुत सारा खाना है, यह फिर से थोड़ी मिलने वाला है? राक्षस के साथ दूंगा और फिर यह खाऊंगा अरे यह तो ठीक नहीं होगा। राक्षस के साथ जब लड़ाई होगी तब सारी चीजें इधर-उधर हो जाएगी। धोखा खाने का मजा नहीं आएगा और राक्षस को मारने से यह वस्तुएं अपवित्र हो जाएगी । फिर खाऊंगा क्या? इसीलिए पहले खा लेता हूं।

3. Bhimsen का खाना

उसने  खाना चालू कर दिया। बकासुर तो गुफा में बैठकर अपने शिकार की राह देख रहा था। बहुत देर हो गई इसीलिए उसकी जान पर आई। गुस्सा होकर गुफा के बाहर आया। और देखा कि Bhimsen बड़े आराम से उसका खाना खा रहे हैं। बकासुर को बहुत गुस्सा आया। एकदम अपनी आंखें लाल करके उसके सामने Bhimsen हंसते  रहे। उसको और भी गुस्सा आया और उसके गुस्से के कारण उसका माथा, उसकी आंखें उसका मुंह लाल हो गया। उसके बाद अब और भी भयंकर दिखने लगा।

बकासुर ने आगे कदम रखा और उसके सामने आया और भीम  को पीछे से एक जोरदार लात लगाई । दूसरा घुसा मारा लेकिन भीम पर कोई असर नहीं हुआ।  बकासुर ने यह देखा। उसको लगा कि यह कोई कमजोर आदमी नहीं है। इसके लिए उसे और बड़ी मार देनी चाहिए। उसने वहां से एक पेड़ को उखाड़ कर उसके ऊपर डाला। 

यह देखने के बाद, वह एक हाथ से खाता गया और बाएं हाथ से उसने पेड़ को पकड़ कर दूर फेंक दिया। और उसने पूरा खाना और सब मिठाईयां सब खा लिया और उसके बाद में  पेय पीने लगा। फिर मुंह धोया और बड़ी स्वस्थता से  राक्षस के सामने Bhimsen ने उस को ललकारा, अरे थोड़ा आराम कर ले थोड़ी देर हुई और उसने ने उसके सामने फिर पुकार की – चलो अब आजा।

जैसे बकासुर उठा दोनों के बीच में बड़ी तड़पड़ी मची। बार-बार Bhimsen बकासुर को नीचे गिराता था। बार-बार राक्षस खड़ा होकर उसके सामने लड़ रहा था। फिर उसको मार कर खड़ा करता था और फिर उसको मारता था।

राक्षस मार खा खा के इतना लहूलुहान हो गया कि उसके चारों तरफ खून का जैसे बड़ा झरना बहने लगा। वह बड़ा कमजोर हो चुका था । यह देखकर भीम ने उसको ऐसे जोर से चौपट मारी कि वह नीचे गिर गया। फिर उसकी कमर पर भीम अपने पूरे जोर से कूदा। इस तरह की छीना- झपटी में अंत में बकासुर को भीमने गिरा दिया। उसकी कमर पर इतना बड़ा झटका मारा कि उसकी कमर टूट गई। राक्षस के प्राण निकल गए और उसके मुंह से खून के फव्वारे उठने लगे। राक्षस बड़ी-बड़ी चीखें मारकर अपना दर्द जाहिर करने लगा।

4. बकासुर वध

बड़ी आवाजें सुनकर गांव वाले को भी अजीब सा लगा। इतने सालों तक सिर्फ उन्होंने जो मरने वाले लोग हैं उनकी आवाज सुनी थी । यह आवाज उन सबसे अलग थी। जैसे राक्षस तड़प रहा हो। तो गांव वाले भी उस तरफ आने को तैयार हो गए। जैसे  लोग आए तो Bhimsen ने राक्षस के शरीर को नगर के द्वार पर लटका दिया। फिर खुद ब्राह्मण के घर नहाने गया ।

Bhimsen

उसने स्नान किया और फिर माता को समाचार सुनाएं। कुंती के आनंद की परिसीमा न रही। पूरे नगर में बड़ा उत्सव चला। सब लोग यह अनजान वीर की जय- जयकार करने लगे। इस तरह भीमसेन ने एक ब्राह्मण की तकलीफ दूर की थी और एक राक्षस का वध किया।

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