Draupadi’s Marriage and Arjun’s Success द्रौपदी का स्वयंवर 1 और अर्जुन लक्ष्य भेद

Draupadi’s Marriage and Arjun’s Success द्रौपदी का स्वयंवर 1 और अर्जुन लक्ष्य भेद

Draupadi का स्वयंवर में अर्जुन का पराक्रम, और पांडव Draupadi से विवाह करते हैं । जब पांडव एकचक्रा नगरी में ब्राह्मण के भेस में घूम रहे थे, तब पांचाल के राजा की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर की तैयारियां हो रही थी । एकचक्रा नगरी के लोगों को इसके बारे में पता चला तो वे वहां जाके इस स्वयंवर वहां की शान बान को  देखने के लिए, बड़े बेताब हो गए । पांडवों को भी लगा कि उनको भी वहां जाना चाहिए । वह भी वहां जाने को बड़े उत्सुक थे, पर माता कुंती जब आज्ञा दे, तब वह जा सकते थे ।

          माता कुंती संसार व्यवहार में बड़ी माहिर थी और बहुत चतुर भी थी । उस ने भांप लिया के उसके बेटे वहां पहुंचने को बहुत बेताब थे।

युधिष्ठिर से उन्होंने कहा, “पुत्र, हम इस नगर में काफी समय तक रहे हैं। यहाँ की सारी अच्छी- अच्छी चीजें हमने पूरी तरह से देख ली । अब हमारे लिए यहां कुछ देखने लायक बाकी नहीं है । यहां के महल, उपवन, जंगल, राजा, लोग सब कुछ हम ने देख लिया है ।  मुझे ऐसा लगता है कि हम एक ही ठिकाने पे अगर बहुत ज्यादा समय के लिए रहेंगे, तो कौरव हमें आसानी से ढूँढ लेंगे ।

इसलिए, हमें यहां से कोई और जगह जाना चाहिए । एक ही जगह रहकर अपना मन भी आनंदित नहीं रहता । हम को यहां भिक्षा भी कम मिलने लगी है । मुझे लगता है कि हमे पांचाल देश में जाना चाहिए । वहां फसल भी अच्छी निकलती है और वहां अब जाएंगे तो हमें भिक्षा भी अच्छी तरह से मिल जाएगी । इसलिए, हम लोग वहां जाएंगे।” Draupadi का स्वयंवर देखने और उसमे भाग लेने पांडव तैयार हो गये।

Draupadi का स्वयंवरपांडव पांचाल देश की ओर बढ़े

पुत्रों ने उनकी बात स्वीकार कर ली । सभी पांडव पांचाल देश जाने के लिए तैयार हो गए और निकल पड़े । उनके साथ में एकचक्रा नगरी के बहुत सारे ब्राह्मण भी चल पडे । कई दिनों की मुसाफिरी के बाद, सब लोग द्रुपद देश की राजधानी में पहुंच गए। पूरे नगर में घूम लिए । फिर वहाँ  एक कुंभारकी झोपड़ी में जाकर, उन्होंने आश्रय लिया । अब तक किसी ने उनको पहचाना नहीं था । इस तरफ द्रुपद अपनी पुत्री कृष्णा के लिए अच्छा वर ढूंढने के लिए चिंतित थे ।

           उन्होंने तो अंतर- मन में तय किया था, के पांचाली को धनुर्धर अर्जुन के साथ विवाहकरना  चाहिए। लेकिन उनको पता चला की वारणावत के महल में जलने से अर्जुन, पांडव और उनकी माँ मर गई है ।  उनको लगता था कि अर्जुन जैसा धनुर्धारी अगर मेरा जमाई हो जाए, तो मैं द्रोणाचार्य से अपना प्रतिशोध पूरा कर सकता हूँ। जिस तरह  द्रोणाचार्यने मुझे अपमानित करने के लिए अर्जुन का उपयोग किया था, उसी तरह अगर द्रौपदी उसके साथ विवाह करती है, तो मैं भी उसी को द्रोण के विरुद्ध इस्तेमाल कर सकता हूं ।

    राजा द्रुपद सोच रहा है :  मेरी प्रतिशोध की भावना अभी तक कम नहीं हुई । मुझे उसे संतुष्ट करना ही होगा । यह तब संतुष्ट होगी जब अर्जुन जैसा कोई समर्थ धनुर्धर मेरा जमाई बने । इसलिए द्रुपद राज ने यह स्वयंवर रचा । हालां कि उनको मालूम था कि अर्जुन अब जीवित नहीं है , लेकिन उसके अंतर-मन में एक आशा की किरण थी । अर्जुन शायद जीवित हो, तो स्वयंवर में यकिनन आ जाएगा ।

लेकिन उन्हें पांडवों और श्री कृष्ण पर भरोसा था, कि वह उन्हें बचा लेंगे । वे शकुनी और दुर्योधन की धूर्तता और चतुराई से खुद को बचाने के लिए काफी चतुर थे ।  इसी आशा के बल पर द्रुपद ने यह खास धनुष्य- अर्जुन के द्वारा चलाया जा सके ऐसा बनवाया था । कर्म – धर्म संयोग से ,उनकी इच्छा पूरी होने को थी । द्रौपदी का स्वयंवर सबके लिए एक अनोखा अर्थ था।

     Draupadi का स्वयंवर – यहाँ स्वयंवर मंडप की व्यवस्था बड़ी अद्भुत थी । स्वयंवर के मैदान के चारो तरफ राजकुमारों और उनके रसाले को ठहरने के लिए आवास बने थे। वहां पे खेल की भी व्यवस्था की गई थी । हर जगह जगह धाम धूम चल रही थी। चारो तरफ बड़ा आनन्द और उल्लास लहरा रहा था। मंडप के बिल्कुल बीच में एक बड़ा धनुष्य रखा हुआ था। धनुष्य का धागा लोहे का बना था।

    परीक्षण के मंच पर, बिल्कुल उसके ऊपर एक सोने का निशान लटक रहा था । निशान के ऊपर एक मछली यंत्र की मदद से घूम रही थी । यह निशान चमक रहा था और बड़े वेग से घूम रहा था । राजेन्द्र ने मंडप में ऐसी घोषणा की – यह बहुत बड़ा और मजबूत धनुष्य है । उसके ऊपर जो घूमने वाला यंत्र है – उसके ऊपर एक निशान है।

देखने वालो की बड़ी भारी भीड़ लगी थी जैसे कि कोई सागर की बड़ी लहर आई हो। अलग अलग प्रकार के संगीत वाद्य सबका मनोरंजन कर रहे थे । द्रुपद का पुत्र धृष्टद्युम्न एक घोड़े पर आया और उसके पीछे पीछे हाथी पर बैठकर द्रौपदी आ रही थी ।

द्रुपद कुमारी कृष्णा सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सजधज के, हाथ में सोने की वरमाला लेकर ,धीरे -धीरे रंग मंडप में आई । कृष्णा ने मंगल स्नान किया था और उसके बालों के फूलों से सुगंध आ रही थी । उन्होंने रेशमी वस्त्र पहने हुए थे और उनके हाथ में वरमाला थी ।

हाथी पर से राजकुमारी द्रौपदी ने उत्तर के जैसे ही सभा मंडप में कदम रखा, तो सारे राज कुमार आपस में बातें करने लगे और उसकी ओर देखने लगे। दूर दूर से आए हुए राज कुमार ज्यादातर क्षत्रिय थे । इसमें आने वाले लोग में से हस्तिनापुर के अंधे राजा धुतराष्ट्र, अंगराज कर्ण, श्री कृष्ण , शिशुपाल और जरासंध थे । और बहुत सारे राजा महाराजा थे । Draupadi का स्वयंवर इनके लिए असफलता का संदे लेकर आया।

धृष्टद्युम्न की घोषणा

Draupadi का स्वयंवर : यह घोषणा करने के बाद धृष्टद्युम्न द्रौपदी की तरफ देखकर बोला , “देखो बहन, यहाँ पर हमको देखने को मिल रहे भारतवर्ष के बहुत सारे क्षत्रिय राजा जैसे धृतराष्ट्र का पुत्र दुर्योधन, युयुत्सू, विकर्ण, दुशासन, अश्वत्थामा, विराट के राजा सुशर्मा ,वासुदेव, शल्य, शिशुपाल, ज़रासंध और अन्य कई राजा महाराजा यहाँ पे हाजिर हैं । जो वीर यह धनुष्य  को उठा के उसका लक्ष्य भेद करता है और पांच तीर यंत्र के बीच से भेजता है उसी को तुमने वरमाला पहनानी है।”

     ब्राह्मणों ने अपना मंत्रोच्चार शुरू किया और यज्ञ में आहुति दी और फिर “स्वस्ति स्वस्ति”, करके द्रौपदी को आशीर्वाद दिया । फिर द्रौपदी का हाथ धृष्टद्युम्न ने पकड़ा और दोनों भाई और बहन मंडप के बीच गए । आगे फिर द्रुपद के युवराज ने  ऊंचे स्वर में एक घोषणा की ।

     ब्राह्मणों ने अपना मंत्रोच्चार शुरू किया और यज्ञ में आहुति दी और फिर “स्वस्ति स्वस्ति”, करके द्रौपदी को आशीर्वाद दिया । फिर द्रौपदी का हाथ धृष्टद्युम्न ने पकड़ा और दोनों भाई और बहन मंडप के बीच गए । आगे फिर द्रुपद के युवराज ने  ऊंचे स्वर में एक घोषणा की ।

     ब्राह्मणों ने अपना मंत्रोच्चार शुरू किया और यज्ञ में आहुति दी और फिर “स्वस्ति स्वस्ति”, करके द्रौपदी को आशीर्वाद दिया । फिर द्रौपदी का हाथ धृष्टद्युम्न ने पकड़ा और दोनों भाई और बहन मंडप के बीच गए । आगे फिर द्रुपद के युवराज ने  ऊंचे स्वर में एक घोषणा की । Draupadi का स्वयंवर शुरु हुआ।

     जिस समय धृष्टद्युम्न यह बात कह रहा था, तब आकाश से रुद्र, आदित्य, वसु, अश्विनी  कुमार, साध्य, मरुद्गण, यमराज, कुबेर, दैत्य, गरुड, नाग, देवर्षी और मुख्य गांधार भी वहाँ उपस्थित थे । वासुदेव नंदन बल राम और भगवान श्री कृष्ण, मुख्य यादव और बहुत सारे महानुभव यहाँ पे हाजिर थे।

Draupadi

सभी शक्तिशाली राजा हार गए लेकिन एक गरीब ब्राह्मण जीत गया

       इसके बाद में धृष्टद्युम्न ने सभी राजकुमारों का Draupadi से परिचय कराया । तब जाके एक के बाद एक राज कुमार धनुष्यको प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए खड़े हो गए। इसमें से बहुत सारे तो धनुष्य  को उठा ही नहीं सके ।  किसी ने अगर उठा लिया, तो उसके वजन से, उसके नीचे दब गए । कई कमान खींचने तक पहुंचे लेकिन फिर कुछ नहीं कर पाए । इस तरह अपना पराजय और नाकामी से मायूस होकर, सारे राज कुमार अपनी- अपनी जगह पर बैठ गए। लगता था यहाँ पे क्षत्रियों का तेजोबल पूरा खत्म हो गया ।   

धृष्टद्युम्न की बात सुनकर दुर्योधन, शाल्व, शल्य और बहुत सारे राजा राजकुमारों ने अपने बल, शिक्षा, गुण और क्रम के अनुसार धनुष्य उठाके प्रत्यंचा चढ़ाने की कोशीश की । लेकिन उनको इतना झटका लगा कि वो धनुष्य  के बल से नीचे गिर पड़े । कुछ तो बेहोश भी हो गए । इसी डर से और लोग जो वहाँ द्रौपदी को पाने की आशा में आए थे, वे बैठे रहे और आगे नहीं आए । उनका तो मन बैठ गया । द्रौपदी को पाने की आशा छोड़ कर अपनी-अपनी जगह पर बैठ गए ।

      दुर्योधन को उदास और निराश देखकर धनुर्धर शिरोमणि कर्ण खड़ा हुआ। उसने धनुष्यको झटपट उठा लिया और प्रत्यंचा धनुष्य पर चढ़ाई ।  सबको लगा कि अब अंगराज कर्ण जरूर इस धनुष्य  बाण से मछली का लक्ष्यवेध करेंगे । लेकिन उतने में द्रौपदी ज़ोर से बोली, “ मैं एक सूतपुत्र से  विवाह नहीं करूँगी।” कर्ण ने यह सुनकर ईर्ष्या भरा हास्य किया और सूरज की ओर देखा, फिर धनुष्य को नीचे रख दिया ।

इस चोट से सहमते हुए, कर्ण अपनी जगह पर बैठ गया । यह सब देखकर बहुत लोग निराश हो गए । तब शिशुपाल आगे आए, लेकिन धनुष्य  हाथ में उठाते ही वह जमीन पर गिर गए । जरासन्ध की भी वही दशा हुई । Draupadi का स्वयंवर एक तरहसे कर्णके अपमानका कारण बना।

      पांडव अपना भेस बदली कर अब गुप्त हो गए थे, पाँचों ने अपनी दाढ़ी और बाल बढ़ा लिए थे । वे भिक्षुक ब्राह्मणों के कपड़े पहने हुए थे, इसके अलावा उपस्थित सभी लोगों को पता थी कि वे जल गए थे और मृत थे । इसलिए किसी ने उन्हें नहीं पहचाना । श्री कृष्ण पहले से ही जानते थे कि वे बच गए हैं और जीवित हैं ।

अर्जुन लक्ष्य भेद में सफल होता है

तब ब्राह्मणों के मंडल से एक तरुण ब्रह्मचारी उठा (अर्जुन ) । और उसको देखते ही लोगों की सभा में बिलबिलाहट चालू हो गई ।  सब तरह तरह की बातें करने लगे, ब्राह्मणों में भी दो पक्ष हो गए। एक पक्ष ने इस तरुण को उत्साह दिया जैसे वो ही खुद धनुष्य उठाकर लक्ष्य भेद करेगा ।और दूसरों ने उनको नीचे गिराया। एक पक्ष ने कहा कि जो काम में शल्य, कर्ण और जरासंध जैसे बड़े बड़े महारथी कुछ नहीं कर पाए उसमें यह अदना सा ब्राह्मण क्या कर पाएगा?  हमारे लिए एक बड़ा अपमान होगा ।

सारे वाद-विवाद बंद हो गए और सभी ब्राह्मणों ने उस तरुण को आशीर्वाद दिया । अर्जुन धनुष्य के पास गया खड़ा रहा और उसने धृष्टद्युम्न से पूछा, “ राजकुमार, ब्राह्मण लक्ष्य भेद कर सकता है ना? स्वयंवर में भाग लेने को उनका अधिकार है ना?”

    धृष्टद्युम्न ने जवाब दिया , “ऋषीवर, जो कोई भी धनुष्य की कमान चढ़ाएगा और शर्त के हिसाब से लक्ष्य भेद करेगा उसको मेरी बहन पति मानेगी । द्रुपद राज लक्ष्यभेद करने वाले में कौशल, बल और  बुद्धि ढूँढ रहे है ।भले वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय हो ।”

अब अर्जुन ने आंखें बंद करके भगवान नाराजण का ध्यान किया और धनुष्य  की कमान को बाण पर चढ़ाया । सारे लोग एकदम मंत्रमुग्ध होकर उसको देख रहे थे। कोई ज्यादा सोचे या आगे बात करें , उसके पहले, अर्जुन ने एक के बाद एक पांच बाण चलाएँ और फिर उस घूमती हुई मछली का वेध कर दिया। निशान टूट कर नीचे आ गया। सारी सभा में एकदम कोलाहल मच गया।

  अर्जुन की सफलता से लोग खुशी का प्रदर्शन करने लगे। लेकिन खासकर क्षत्रिय जो असफल रहे वे और मायूस और गुस्सा हो गए । लेकिन तब तक तो संगीत के वाद्य और विवाह  के नगारें बजने लगे और ब्राह्मणों ने आनंद का प्रदर्शन किया । कुछ ही देर में द्रौपदी ने अर्जुन को वरमाला पहनाई ।Draupadi का स्वयंवर वहाँ हो गया, पर ब्याह होना शेष था ।

  सभा में और ब्राह्मण तो बैठे रहे ; लेकिन युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव वहाँ से उठकर चले गए । उसके दो कारण थे । एक तो उनको माता जी को यह खुशखबर देनी थी, और दूसरा पांचों पांडवों को एकसाथ देखकर कहीं कौरव उनको पहचान न लें और उनकी तकलीफ बढ़ ना जाए।

        जो क्षत्रिय यह सारी बातें देख रहे थे, वह काफी मायूस हो गए । निराशा में शायद अर्जुन पर हमला ना करे, यह सोचकर भीम पीछे रह गया । भीमसेन की यह शंका सच हो गई ।

Draupadi का स्वयंवर होते होते , राजकुमारों में बड़ा शोर-गुल मच गया और राजकुमारों का जोश बढ़ गया । वह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगे ,“ स्वयंवर राजकुमारों के लिए ही होते  है, ब्राह्मणों के लिए नहीं । एक ब्राह्मण को कैसे Draupadi वरमाला पहना सकती है ?

अगर उसे कोई क्षत्रिय पसंद नहीं आया तो उसे जिंदगी भर विवाह नहीं करना चाहिए । लेकिन उसे ब्राह्मण से तो विवाह नहीं करनी चाहिए । यह कैसे हो सकता है? स्वयंवर की जो प्रथा है उसके लिए यह बहुत घातक है । इस तरह धर्म की रक्षा करने के लिए भी यह विवाह नहीं होना चाहिए ।”

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